*ЁЯЪйрд░ाрдЬрдХेрд╢рд░िрдпाЁЯЪй* *рдЬीрд╡рди рдоें рд╕ुрдЦ рджुрдЦ рд╣ाрдиि рд▓ाрдн рдоाрди рдЕрдкрдоाрди рдЖрджि рдкрд░िрд╕्рдеिрддिрдпां рдЪрд▓рддी рд░рд╣рддी рд╣ैं* ।
जीवन में सुख दुख हानि लाभ मान अपमान आदि परिस्थितियां चलती रहती हैं ।
किसी दिन अनुकूलताएँ अधिक होती हैं, किसी दिन प्रतिकूलताएँ। जिस दिन अनुकूलताएँ अधिक होती हैं, उस दिन व्यक्ति प्रसन्न रहता है। जिस दिन प्रतिकूलताएँ अधिक होती हैं , उस दिन व्यक्ति दुखी उदास निराश हो जाता है।
प्रसन्नता के भी दो प्रकार हैं । एक - बाह्य प्रसन्नता होती है , जो इंद्रियों से सुख भोगे जाते हैं , उससे प्राप्त होती है। दूसरी - आंतरिक प्रसन्नता होती है , जो अंदर आत्मा से मिलती है । वह कैसे मिलती है ? सेवा परोपकार दान दया ईश्वर उपासना यज्ञ करना प्राणियों की रक्षा, आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति करना, आर्य विद्वानों का सत्संग करना इत्यादि शुभ कर्मों के आचरण से होती है।
*बाह्य इंद्रियों से सुख भोगना , यह अधिक अच्छा नहीं माना जाता , क्योंकि इससे संसार में राग द्वेष मोहमाया आदि बढ़ती है.*
और *जो आंतरिक प्रसन्नता शुभ कर्मों के आचरण से प्राप्त होती है, वह प्रसन्नता उत्तम मानी जाती है.*
*इसलिए सेवा परोपकार आदि शुरू कर्मों का आचरण करके आंतरिक प्रसन्नता को प्राप्त करें।* यही वास्तविक जीवन है -
🚩राजकेशरिया🚩
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