*рдЕрднिрдоाрди।* *рдЬिрд╕े рдеोрдб़ा рд╕ा рдЬ्рдЮाрди рд╣ो рдЬाрдП , рддो рдЙрд╕рдХो рдЕрднिрдоाрди рднी рдЖрдиे рд▓рдЧрддा рд╣ै। рдЬैрд╕े рд╣ी рдЕрднिрдоाрди рдЖрдиे рд▓рдЧрддा рд╣ै рддो рдЬ्рдЮाрди рдХी рдк्рд░ाрдк्рддि рд░ुрдХ рдЬाрддी рд╣ै , рдФрд░ рд╡्рдпрдХ्рддि рдХा рдлिрд░ рд╕े рдкрддрди рдЖрд░ंрдн рд╣ो рдЬाрддा рд╣ै|*
"खाने पीने से सुख मिलता है", यह बात सब जानते हैं । इसलिए लगभग सभी लोग खाने पीने का सुख लेते रहते हैं । इसी प्रकार से अन्य इंद्रियों के भी विषयों का भोग करते रहते हैं , क्योंकि उनमें सुख मिलता है ।
परंतु इन पांच इंद्रियों के विषयों का सुख भोगने से , यह देखा जाता है कि इच्छा शांत नहीं होती , बल्कि और अधिक अधिक बढ़ती जाती है ।
अब इसके अतिरिक्त जब व्यक्ति संसार के पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करता है , तो उससे उसको अधिक शांति मिलती है । अर्थात *इंद्रियों के विषय भोग से जो सुख मिलता है, उसकी तुलना में , ज्ञान विज्ञान से जो सुख मिलता है , वह अधिक अच्छा और तृप्ति दायक होता है।*
*अब सांसारिक वस्तुओं के विषय में ज्ञान, तथा ईश्वर संबंधी ज्ञान , इन दोनों की तुलना करें , तो ईश्वर संबंधी जो ज्ञान मिलता है, उसमें और अधिक तृप्ति होती है।*
परंतु जैसे जैसे व्यक्ति में किसी भी प्रकार का ज्ञान बढ़ता है , तो एक समस्या और उत्पन्न होती है , वह है *अभिमान।*
जिसे थोड़ा सा ज्ञान हो जाए , तो उसको अभिमान भी आने लगता है। जैसे ही अभिमान आने लगता है तो ज्ञान की प्राप्ति रुक जाती है , और व्यक्ति का फिर से पतन आरंभ हो जाता है ।
इसलिए कहा जाता है कि *अभिमान और ज्ञान इन , दोनों में परस्पर विरोध है. अगर कोई व्यक्ति अभिमानी है , तो उसे वास्तविक ज्ञान नहीं हो पाएगा . और अगर किसी को वास्तविक ज्ञान हो गया, तो उसे अभिमान नहीं होगा।* इसलिए ज्ञानी बनें, अभिमानी नहीं -
🚩 राजकेशरिया🚩
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