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*फूल मत तोड़ो*

वृक्षों से फूल तोड़कर
मन्दिर में चढ़ा दिया
फिर इस झूठ को तुमने
पूजा का नाम दिया।

पौधों पे खिले थे तो
ये चढ़े ही हुए थे
जिंदा थे जब तक
रस से भरे हुए थे।

चाँद तारों से कर रहे थे बात
गंध हवाओ में बिखेर रहे थे
वास्तव में तब वो प्रभु के
चरणों में चढ़े हुए थे।

जिंदा फूलों को तोड़
तुमने उन्हें काट डाला
तुम्हारी अनूठी पूजा ने
इन फूलों को मार डाला।

अपनी ही बनाई मूर्ति पर
फिर चढ़ा उन्हें आये
और अपनी इस करनी पर
तुम फूले न समाए।

मनुष्य भी एक वृक्ष है
फूल इस पर भी खिलते हैं
प्रज्ञा, ध्यान और चैतन्य से
ये नित रोज मिलते हैं।

सद्गुणों को धारण करो
जीवन भरलो इन फूलों से सदा
इनकी महक से भर दो
सबके जीवन में सुख सम्पदा।

इन फूलों को खिलाओ और
चढ़ाओ परमात्मा के चरणों में
झूठे फूलों को चढ़ाकर तुम न
इतराओ अपने मन में।

🚩राजकेशरिया🚩

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