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*प्रणाम..........🙏🙏🙏🙏🙏*

*समाज को समय दें और संस्कारवान पीढ़ी तैयार करें.......🙏*

दुनियाभर में भारतीय संस्कृति, सदाचारपूर्ण विचारधारा और आचरण की दुहाई दी जाती रही हो वहां इस तरह के कुत्सित कृत्य आखिर किस बात का इशारा कर रहे हैं.......क्या समाज में सभी रिश्ते स्वार्थ आधारित हो गए हैं........?क्या हम संस्कार शुन्य हो गए हैं........?हमारी सामाजिक व्यवस्था का तानाबाना बिखरने लगा है......समाज में विकृति फैलती जा रही है......

स्वार्थपरकता में अतिशय वृद्धि होती जा रही है.......परमार्थ भी करेंगे तो कहीं न कहीं उसमें हमारा स्वार्थ ही छुपा रहेगा..........हमारी सोच, हमारा आचरण,हमारा व्यवहार सब कुछ व्यक्तिवादी होता जा रहा है.....सब कुछ मैं के लिए है, हम का स्थान घटता जा रहा है........शायद इसी का परिणाम है कि समाज में विकृति आ रही है.........व्यक्ति स्वहित की बात सोचने लगा है, परहित को भुला दिया गया है.......ऐसा नहीं है कि समाज में सभी इसी तरह की सोच रखने वाले हैं लेकिन अधिसंख्य जन इसी तरह की सोच रखने वाले होते जा रहे हैं.........

कहते हैं कि बच्चे की प्रथम पाठशाला परिवार ही है....परिवार में अर्थात प्रथम पाठशाला में ही यदि व्यक्ति को सही शिक्षा-दीक्षा नहीं मिलेगी तो व्यक्ति बड़ा होकर भटकेगा ही..........परिवार से ही व्यक्ति को संस्कार मिलते हैं और परिवार से ही व्यक्ति झूठ-फरेब, स्वार्थपरता की शिक्षा ग्रहण करता है..........अनैतिक कृत्यों में व्यक्ति तभी फसता है जब उसे परिवार से उच्च संस्कार नहीं मिलते.........संस्कारशीलता का गुण व्यक्ति को परिवार से ही मिलता है.........भौतिकता की दौड़ में एकल परिवार की ओर हमारा समाज जा रहा है......संयुक्त परिवार का दौर समाप्त सा हो गया है........इसी का परिणाम है कि वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है.....एकल परिवार होने से संतान के पास अपने माता-पिता के लिए समय नहीं रहता और माता-पिता निराश्रित सा जीवन जीने के लिए मजबूर हो जाते हैं या फिर वृद्धाश्रम की ओर रुख कर लेते हैं.......यह संस्कारहीनता का ही परिणाम है.......

हमारी शिक्षा प्रणाली भी दोषपूर्ण है.....अब शिक्षा में भी नैतिक शिक्षा पर बल नहीं दिया जाता..... शायद इसी लिए नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है और संस्कारहीनता की स्थिति बनती जा रही है...........परिणामस्वरुप विकृत मानसिकता को बढ़ावा मिल रहा है.......अभी भी समय है कि हम अपनी सदियों से चली आ रही परम्पराओं और नैतिक मूल्यों को पुनर्स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाए ..  अपने बच्चों और परिवार को समय दें, अपनी संतान को संस्कारवान एवं शीलवान बनाएं......संस्कारी जन का आधुनिकता से विरोध नहीं है...... सही रुप में आधुनिकता से तादात्म्य स्थापित कर सुसंस्कृत समाज की स्थापना की जा सकती है............आवश्यकता संस्कारवान पीढ़ी को तैयार करने की है न कि विकृत मानसिकता वाली पीढ़ी की........

*🙏श्री भवानी यूवा शक्ति राजपूत समाज सेवा ग्रुप गुजरात🙏*

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