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नमस्ते...........
"आइए प्रकृति के नियम को आत्मसात करने का प्रयास करें "
"परिवर्तन नियम था.........हैं.... ..हमेशा रहेगा....... "

आज हम २१वीं सदीं की युवावस्था में प्रवेश कर चुके है.....लेकिन हमारा समाज आज भी १९वीं सदीं में जी रहा है... समाज में इस नयी सदी कि नयी उर्जा का संचार करने के लिए, हमें नये उर्जावान नेतृत्व की आवश्यकता है.... समाज के विकास को और आगे बढाने के लिए.... समाज के युवा पीढी़ के उच्च शिक्षित व आत्मनिर्भर लोगों को आगे लाने की आवश्यकता है.....क्योकि जो स्वयं आत्मनिर्भर होगा....वही एक आत्मनिर्भर समाज का निर्माण कर सकेगा.....

आज समाज की कर्मशील आबादी का ७० प्रतिशत युवा वर्ग है..... ऐसी स्थिती मे समाज मे युवाओ की भागीदारी भी होनी चाहिए... चाहे वो समाज के किसी भी घराने या खानदान से हो... यह बुरा मानने कि बात नही है...लेकिन यह एक सच्चाई है कि..... आज विभिन्न प्रकार के समाजो में, संस्थाओं में, संगठनों में, सभी का नेतृत्व ५५ से ७५ वर्ष तक के लोग ही कर रहे हैं.... समाज मे युवा पीढी़ की भागीदारी न के बराबर है.....और ये कुछ हद तक सही भी है, लेकिन उम्र के इस पडा़व मे वरिष्ट वर्ग, युवा वर्ग को समझने मे नाकाम साबित हो रहा है...जिसके कई दुष्परिणाम सामने आ रहे है.....सबसे बडा दुष्परिणाम वरिष्ट वर्ग और युवा वर्ग के विचारो मे मतभेद होना है.... वरिष्ठ वर्ग का मत युवाओ की समझ मे नही आता है तथा युवाओ की सोच वरिष्ठ वर्ग के समझ के बाहर है... कई युवाओ की शिकायत है कि वरिष्ठ वर्ग , युवाओ को समझना ही नही चाहता है....

परन्तु हम सभी यह अच्छी तरह से जानते है कि समाज का सम्पूर्ण विकास तभी सम्भव है जब सभी कदम से कदम मिलाकर चले.... क्योकि युवा वर्ग का जोश और वरिष्ट बुद्धिजीवियो का तजुर्बा दोनो ही समाज के विकास के लिए अति आवश्यक है.....इसलिए युवा पीढी़ को आगे लाना चाहिए......ताकि वो अपनी उर्जा और जोश का उपयोग समाज की विकास गति को और आगे बढ़ने में कर सकें..... समाज की प्रगति को बढावा देने में युवा वर्ग का जोश का उपयोग हो सकता है.....लेकिन निगरानी अगर वरिष्ट बुद्धिजीवियो द्वारा की जाए तो एक सुदृढ़ समाज का निर्माण हो सकता है.... और ये दोनों के तालमेल से समाज की गाड़ी समय के साथ साथ हमेशा आगे चलती रहेगी....

युवावर्ग की भावनाओं को समझते हुए कई समाज ने युवा वर्ग को समाज की बागडोरअपने सानिध्य में दे दी है...... एवं समाज प्रतिपल उन्नति की ओर अग्रसर है.....

अब मैं सामाजिक बंधुओं से पूछना चाहता हूँ कि क्या आप अपने समाज  *क्षत्रिय राजपूत समाज* के उत्थान में भागीदार बनना चाहते हैं..........?
*क्या आप अपने आप को इतना मजबूत मानते हैं कि हमारे वरिष्ठजनों की धरोहर को भलीभाँति सम्भाल सकतें हैं.....?*

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