बेटी बचाओ

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हे...मनुष्य !
सुन ले मेरी पुकार
मैं भी एक इंसान हुँ
मारा जाता हैं मुझें पेट में
क्या मेरे लिये वों कोख नहीं???
जब पता चला परिवार कों
बेटा नहीं बेटी हुँई कोख सें
दे दी जाती अफीम मुझें
ताकी बचपन में ही मर जाऊँ
ऐसा क्या गुनाह किया???
जो यु बचपन मार दिया
क्या वों एक माँ नहीं???
कैसै मर गई ममता उसकी???
क्या मैं उसकी संतान नहीं???
हे...मनुष्य!
सुन लें मेरी पुकार
मैं भी एक इंसान हुँ
कष्ट देखा दुख देखा
पाला मेरे माँ बाप नें
पढ़ लिखकर शिक्षित बनी
हो गई एक जवान सीं
आया रिश्ता यहाँ वहाँ सें
दहेज के नाप तौल सें
शादी हो गई ऊँचे कुल में
मैं चली ससुराल में
सुन ताने दहेज कें
मेरा धैर्य खो गया था
किसें सुनाऊँ दुखड़ा अपना
अपनों को क्यों रूलाऊ मैं ??
बड़े कष्टों सें पाला माँ बाप नें
उनकों दुख क्यों पहुँचाऊ मैं???
अन्दर ही अन्दर टूट गई मैं
जीवन सें मैं हार गई
आया एक दिन ऐसा भी
सुला दिया ससुराल नें
ऐसी गहरी नींद में
दहेज की हवाओं सें
मैं भी रही सोती
रोते बिलखते रहे अपने
मेरे लीला समाप्त हो जाने सें
उनको क्या लेना था ??
वों तो दहेज के लोभी थैं
एक नया घर जो ढूढ़ रहे थैं
ऐसे ऐसे खत्म हो गई
बेटियों की कहानी रे...
हे...मनुष्य!
सुन ले मेरी पुकार
मैं भी एक इंसान हुँ
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